एकाग्रता कैसे साधे?

एकाग्रता तो चाहिए पर वह हो कैसे उसके लिए क्या करना चाहिए भगवान कहते हैं आत्मा में मन को स्थिर करके  दूसरा कुछ भी चिंतन में करें परंतु यह सदे कैसे मन को बिल्कुल शांत करना बड़े महत्व की बात है विचारों के चक्र को जोर से रो के बिना एकाग्रता होगी कैसे बाहरी चक्र तो किसी तरह रोक भी लिया जाए परंतु भीतरी चक्र तो चलता ही रहता है चित्त की एकाग्रता के लिए यह बाहरी साधन जैसे-जैसे काम में लाते हैं वैसे-वैसे भीतर का चक्र अधिक वेग से चलने लगता है आप आसन जमाकर तन कर बैठ जाइए आंखें स्थिर कर लीजिए परंतु इतने से मन एकाग्र नहीं हो सकेगा मुख्य बात यह है कि मन का चक्र बंद करना सजना चाहिए बात यह है कि बाहर का यह अपरंपार संसार भरा रहता है उसको बंद किए बिना एकाग्रता का साधना असंभव है अपनी आत्मा की अपार ज्ञान शक्ति हम भाई यह चित्र वस्तुओं में खर्च कर डालते हैं लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए जिस तरह दूसरे को नए लूटते हुए स्वयं अपने प्रियतम से धनी बनने वाला पुरुष आवश्यकता के बिना खर्च नहीं करता उसी तरह हमें भी अपनी आत्मा की ज्ञान शक्ति क्षेत्र बातों के चिंतन में खर्च नहीं करनी चाहिए यह ज्ञान शक्ति हमारी अमूल्य खाती है परंतु हम उसे स्थूल विषयों में खर्च कर डालते हैं यह सब अच्छा नहीं बना इसमें नमक कम पढ़ा अरे भाई कितनी रत्ती नमक कम पढ़ा नमक तनिक सा कपड़ा इस महान विचार में ही हमारा ज्ञान खर्च हो जाता है बच्चों को पाठशाला की चारदीवारी के अंदर ही पढ़ाते हैं कहते हैं कि यदि पेड़ के नीचे पढ़ आएंगे तो कोई कोयल और चिड़िया देखकर उनका मन एकाग्र नहीं होगा बच्चे ही जो ठहरे कोई चिड़िया नहीं दिखी तो हो गई उनकी एकाग्रता परंतु हम हो गए हैं घोड़े हमारे अब सिंह निकल आए हैं हमें साथ-साथ दीवारों के भीतर भी किसी ने बंद कर रखा तो भी हमारे मन की एकाग्रता नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया की फालतू बातों की चर्चा हम करेंगे जो ज्ञान परमेश्वर की प्राप्ति करा सकता है उसे हम साग सब्जी के जैकी की चर्चा करने में ही खो देते हैं और उसमें कृतार्थ मानते हैं