किसी ने कहा है पैसा खुदा तो नहीं है पर खुदा से कम भी नहीं है पैसे पर जितना बोला गया है उससे अधिक उस पर सोचा गया है हम बाहर से पैसे के विषय पर बोलते नहीं परंतु हमारी सोच का सर्वे सर्वा पैसा ही है हमारे मुख में तो नारायण होता है परंतु मन में लक्ष्मी विराजमान रहती है पैसा एक ऐसी चीज है जो आपके हाथ में कम और दिमाग में अधिक रहती है
अर्थ अनर्थ है क्या अर्थ व्यर्थ है क्या अर्थ सार्थक है क्या जीवन के कई जटिल प्रश्नों पर विचार तो हम करते हैं परंतु वह विचार केवल ऊपरी स्तर पर होता है इन्हीं विचारों की श्रृंखला में एक विषय अक्सर आता है कि धन की क्या कितनी कब और कहां आवश्यकता है
पैसा परिवारों को बांधता भी है और तोड़ता भी है पैसा भय भी लाता है और अभय भी बनाता है पैसे के बल पर आप नचवातें भी हैं और पैसा आपको नचाता भी है संतों ने भी पैसे के विषय में सोचा है और यह पाया कि पैसे को तीन भागों में बांटा जा सकता है पैसे को कमाना पैसे को संभालना पैसे को खर्च करना संतों ने कहा तीनों स्तर दुखदाई है सबसे पहला पड़ाव है कमाना आदमी कमाने के लिए हर वक्त दर-दर की ठोकरें खाता है दूसरा पड़ाव है संभालना भारत में तो खास तौर पर संभालना और मुश्किल है लोग पैसे दीवारों में चुनवा देते हैं जमीन में दबा देते हैं
भारत में अरबों रुपया बैंकों में ऐसा पड़ा है जिसका कोई लेनदार नहीं पैसा आए तो व्यक्ति चोरों से लुटेरों से डरता ही है पर आदि शंकराचार्य अपनी पुस्तक भज गोविंदम में पहले ही कह चुके हैं कि धनवान अपनी औलाद से भी डरता है तीसरा पड़ाव है खर्च करना पैसा दूसरे का हो तो खर्चना आसान है परंतु अपना हो तो मामला गड़बड़ हो जाता है सबसे अधिक खरीदारी वे युवा करते हैं जो कमाते नहीं
सौ टके की बात यह है कि पैसा एक विचार है जिसमें हम यह सोचते हैं कि जब दुख आएगा तो पैसा हमारी सहायता करेगा करें या ना करें यह अलग विषय है अंत में इतना ही है कि जब यह कहा जाता है कि अर्थ अनर्थ है इसका सीधा सा मतलब है कि पैसा एक जरूरी पर बेहद खतरनाक वस्तु है
उदाहरण के लिए बिजली के मीटर के ऊपर खतरा भले ही लिखा होता है लेकिन इसका मतलब यह कभी नहीं कि बिजली का प्रयोग न करें बल्कि उसका प्रयोग बड़ी सावधानी से करें और अगर आपने बिजली का प्रयोग असावधानी से किया तो बड़ी परेशानी भी खड़ी हो सकती है इसी तरह धन का प्रयोग सावधानी से करें अन्यथा अर्थ अनर्थ तो कर ही देगा